प्रातः स्मरण मंत्र | Pratah Smaran Mantra

Pratah Smaran Mantra In Hindi

प्रातः स्मरण मंत्र वे पवित्र श्लोक होते हैं जिन्हें सुबह उठते ही, विशेष रूप से बिस्तर छोड़ने से पहले, मन, वाणी और कर्म की शुद्धि हेतु बोला जाता है। ये श्लोक हमारे मन को पवित्र कर पूरा दिन मंगलमय एवं शुभ करने में सहायक होते हैं ऐसा शस्त्रों में वर्णित किया गया है। इन श्लोक का उच्चारण करने से मन शांत और स्थिर होता है, हमारा मन नकारात्मक विचारों से दूर रहता है, दिनभर सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है, कार्यों में सफलता प्राप्त होती है एवं ईश्वर कृपा और आत्मबल बढ़ता है। अतः हमें प्रथम ब्रम्ह-मुहूर्त में उठने के पश्चात इस पोस्ट में वर्णित श्लोकों का स्मरण करने  का हर संभव प्रयास करना चाहिए। 


Pratah Smaran Mantra

Pratah Smaran Mantra Lyrics

प्रथम ब्रम्ह-मुहूर्त में उठने का अभ्यास करें। यह बहुत ही सुनहरा समय होता है क्यूकी जब तक सूर्योदय नहीं होता है,तब तक माया सोती रहती है। इस ब्रम्ह-मुहूर्त में सगीतज्ञ संगीत का, विधार्थी विद्या का अभ्यास करते हैं तथा योगी, महात्मा आसन, प्राणायाम आदि करते हैं। इसी समय हम उठने का अभ्यास करें। सूर्योदय हो जाने पर माया जाग जाती है और वह हमें भक्ति एवं ईश्वर का भजन करने में स्वयं की उपस्थिति एवं दुनियादारी में मन को प्रवाहित करने लगती है।

अतः हमें बिस्तर से निद्रा के आगोस से जागने के पश्चात सबसे पहले अपने हथेली को देखते हुए सबसे पहले यह मंत्र स्मरण करना चाहिए-

* कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती।
करमूले तु गोविन्दः प्रभाते करदर्शनम्॥

भावार्थ - हाथों के अग्रभाग में लक्ष्मी, मध्य में सरस्वती और मूल में भगवान गोविंद निवास करते हैं। प्रातःकाल अपने हाथों का दर्शन करना अत्यंत शुभ होता है।

बाद में बिस्तर पर बैठे-बैठे सर्व देवों की स्तुति करनी चाहिए-

श्री गणेश स्तुति

किसी भी शुभ कार्य, दिन की मंगलमय शुरुवात, पूजा, यज्ञ, कथा, या नए कार्य की शुरुआत से पहले भगवान श्री गणेश का स्मरण करना अत्यंत फलदायी माना गया है। गणपति बप्पा विघ्नहर्ता हैं, जो सभी बाधाओं को दूर कर सफलता का मार्ग प्रशस्त करते हैं।

* गजाननं भूतगणादि सेवितं
कपित्थजम्बूफलचारुभक्षणम्।
उमासुतं शोकविनाशकारकं
नमामि विघ्नेश्वर पादपङ्कजम्॥

भावार्थ - जो भूतगणों द्वारा सेवित हैं, कपित्थ और जामुन फल प्रिय हैं, माता पार्वती के पुत्र और शोक नाश करने वाले हैं, ऐसे विघ्नेश्वर के चरणकमलों को मैं नमन करता हूँ।

श्री शंकर भगवान स्तुति 

देवाधिदेव महादेव भगवान शिव स्तुति हमें  आनंदमय, करुणामयी और वैराग्यपूर्ण स्वरूप की ओर अग्रसरित करती है। इसका पाठ करने से मन को गहरी शांति, वैराग्य और शिव कृपा की अनुभूति होती है।

* सानन्दमानन्दवने वसन्तं
आनन्दकन्दं हतपापवृन्दम्।
वाराणसीनाथमनाथनाथं
श्रीविश्वनाथं शरणं प्रपद्ये॥

भावार्थ - जो आनंद और परम आनंद के वन (काशी) में निवास करते हैं, जो आनंद के मूल स्रोत हैं और पापों के समूह का नाश करते हैं,जो काशी के स्वामी और अनाथों के भी नाथ हैं, ऐसे श्री विश्वनाथ (भगवान शिव) की मैं शरण लेता हूँ।

श्री प्रभु स्तुति 

इस स्तुति में प्रभु की कृपा से ही हमें संसार में जिनकी कृपा प्राप्त कर सभी कार्य सिद्ध होते हैं। सभी प्राणियों को प्रभु की शक्ति से ही अपने समस्त कार्यों में सफलता प्राप्त होती है। 

* मूकं करोति वाचालं पंगुं लङ्घयते गिरिम्।
यत्कृपा तमहं वन्दे परमानन्द माधवम्॥

भावार्थ - जिनकी कृपा से गूंगा बोलने लगता है और अपंग भी पर्वत लांघ सकता है, ऐसे परमानंद स्वरूप श्री हनुमान जी को मैं नमन करता हूँ।

श्री देवी स्तुति 

माँ जगदम्बा के मंगलमय, करुणामयी और रक्षक स्वरूप का स्मरण कराती है। इसका पाठ करने से जीवन में सुख, शांति, सुरक्षा और समृद्धि आती है।

* सर्वमङ्गल माङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरी नारायणी नमोऽस्तुते॥

भावार्थ - हे माँ नारायणी! आप समस्त मंगलों में मंगल करने वाली हैं। आप शिवा हैं, सभी कार्यों को सिद्ध करने वाली हैं। आप शरण देने वाली, त्रिनेत्री और गौरी स्वरूपा हैं, मैं आपको बार-बार नमन करता हूँ।

श्री सूर्य स्तुति 

सूर्य देव को ऊर्जा, तेज, आरोग्य और आत्मबल का स्रोत माना गया है। इस स्तुति का नियमित जाप करने से जीवन में स्वास्थ्य, सम्मान और सकारात्मकता की वृद्धि होती है।

*जपा कुसुम संकाशं काश्यपेयं महाद्युतिम्।
तमोऽरिं सर्वपापघ्नं प्रणतोऽस्मि दिवाकरम्॥

भावार्थ - जो जपा पुष्प के समान तेजस्वी हैं, कश्यप ऋषि के पुत्र और महान तेज से युक्त हैं, अंधकार और समस्त पापों का नाश करने वाले, ऐसे सूर्य देव को मैं नमन करता हूँ।

पंच पतिव्रता स्तुति 

इस श्लोक के स्मरण से वैवाहिक जीवन में सुख, शांति और पवित्रता बनी रहती है।

* अहिल्या द्रौपदी तारा
कुंती मंदोदरी तथा।
पंचकन्या स्मरेन्नित्यं
महापातक नाशनम्॥

भावार्थ - जो व्यक्ति अहिल्या, द्रौपदी, तारा, कुंती और मंदोदरी — इन पाँच पवित्र स्त्रियों का प्रतिदिन स्मरण करता है, उसके बड़े-से-बड़े पाप भी नष्ट हो जाते हैं।

सप्त चिरंजीवी स्तुति 

इस श्लोक का स्मरण करने से दीर्घायु, आरोग्य, भयमुक्ति और पाप नाश का फल प्राप्त होता है।

* अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनुमांश्च विभीषणः।
कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरंजीविनः॥

सप्तैतान् संस्मरेन्नित्यं मार्कण्डेयमथाष्टमम्।
जीवेद्वर्षशतं सोपि सर्वव्याधिविवर्जित ।। 

भावार्थ - अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनुमान, विभीषण, कृपाचार्य और भगवान परशुराम ये सात महामानव चिरंजीवी हैं। यदि  इन सात महामानवों और आठवे ऋषि मार्कण्डेय का नित्य स्मरण किया जाए तो शरीर के सारे रोग समाप्त हो जाते है और 100 वर्ष की आयु प्राप्त होती  है।

श्री गुरु स्तुति 

गुरु को ब्रह्मा, विष्णु और महेश के समान माना गया है, क्योंकि गुरु ही अज्ञान के अंधकार को दूर कर ज्ञान का प्रकाश प्रदान करते हैं। गुरु कृपा के बिना जीवन में आध्यात्मिक और सांसारिक उन्नति संभव नहीं मानी जाती।

* गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः । 
* अखंड मंडलाकारं व्याप्तम येन चराचरम।
तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्री गुरवे नमः।।

भावार्थ - गुरु ही ब्रह्मा हैं (सृजनकर्ता), गुरु ही विष्णु हैं (पालनकर्ता) और गुरु ही महेश्वर हैं (संहारकर्ता)। गुरु ही साक्षात् परब्रह्म हैं—ऐसे श्री गुरु को मैं नमन करता हूँ।
जो अखंड ब्रह्मांड में चर-अचर सबमें व्याप्त परम सत्य का बोध कराते हैं और उस परम पद का दर्शन कराते हैं, ऐसे श्री गुरु को मैं नमन करता हूँ।

इन श्लोक का ध्यान करने का पश्चात बिस्तर से माँ धरती (भूमि) पर पैर रखने से पहले इस श्लोक का उच्चारण करना चाहिए। 

* समुद्र वसने देवी पर्वत स्तन मंडिते।
विष्णु पत्नी नमस्तुभ्यं पाद स्पर्शं क्षमश्वमेव॥ 

भावार्थ - समुद्र, जिसमें वास करते हैं, जिसने पर्वतों को धारण किया हुआ है। संसार को पोषित करने वाली हे! विष्णु की पत्नी, आपको चरणों से स्पर्श करने जा रहा हूं, इसके लिए मुझे क्षमा करना मां।

इसके पश्चात माता-पिता गुरुजन एवं परिवार में बड़े बुजुर्गों का चरण स्पर्श कर आशीर्वाद प्राप्त करते हुए दिन को प्रारंभ करना चाहिए। 

फिर अपने नित्य कर्म कर स्नान के पश्चात 
ध्यान वंदना करना चाहिए। 

* गजाननं भूतगणादि सेवितं,
कपित्थजम्बूफलचारुभक्षणम्।
उमासुतं शोकविनाशकारणं,
नमामि विघ्नेश्वरपादपङ्कजम्॥

भावार्थ - मैं उन गजानन भगवान गणेश को नमन करता हूँ, जो भूतगणों द्वारा सेवित हैं, जिन्हें कपित्थ (कैथ) और जामुन जैसे फल प्रिय हैं, जो माता पार्वती के पुत्र हैं और जो समस्त शोक व विघ्नों का नाश करने वाले हैं।

श्री गजाननं स्तुति 

* गाइए गणपति जगबंदन।
शंकर सुवन भवानी नंदन॥
सिद्धि सदन गजवदन विनायक,
कृपा सिंधु सुंदर सब लायक॥
मोदक प्रिय मुद मंगलदाता,
विद्या वारिधि बुद्धि विधाता। 
माँगत तुलसीदास कर जोरे,
बसहिं राम सिय मानस मोर। 

इसके पश्चात आप दैनिक स्तुति कर आप दिन की शुरुवात करे। आपका दिन मंगलमय हो इसी कामना के साथ दिन की शुरुवात करे अगर ईश्वर ने चाहा तो सर्वत्र विजय प्राप्त होगी। 

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